ताज - मैनें उसको इतना देखा जितना देखा जा सकता था
साल 2025,
आखिर हफ्ता...वो भी 25 दिसंबर की शाम.....ताज कारीडोर पूरी तरह खचा-खच.....इस भीड़
में पूरे परिवार के लगभग दस सदस्यों के साथ मैं ताजमहल के दीदार के लिए पहुंचा था,
दरअसल यह समय ही हमारे छुट्टी का होता है और यह जानते हुए
भी हमने रिस्क लिया कि भीड़ बहुत होगी..... नौकरी पेशा लोगों की यही मजबूरी है कि
वे अपने घूमने की योजना भी खुद नहीं बच्चों की छुट्टी के हिसाब से बनाते हैं
इस साल 25 दिसंबर
की शाम हम उस भीड़ का हिस्सा थे जिसका जिक्र कुमार विश्वास के उद्बोधन में भी
गूंजा था..... मैं कुमार विश्वास जैसे नामवर कवि के विषय में कुछ कह पाने लायक नहीं हूं मगर तुलना करने की
बात बेमानी है, आप
सचिन को सचिन ही रहने दें उसे गावस्कर के साथ तुलना करके तोला-मासा मत करें,
उसी तरह किसी लाल किले और काशी विश्वनाथ मंदिर या हरा रंग
और भगवा रंग , या
फिर बैंगन और गोभी जैसी बेमानी तुलना का कोई अर्थ नहीं है..... भीड़ कहां ज्यादा
है यह भी मेरे लिए विषय नहीं रहा, मेरे घर से कुछ दूरी पर जो देसी शराब की दुकान है वहां रोज
सुबह मंदिर से भी ज्यादा भीड़ रहती है तो इसका मतलब मैं क्या निकालूं?
चलते हैं ताज में मुग़लकालीन बेहतरीन इमारतों में शामिल इस शानदार संरचना को
संसार के सात आश्चर्यो में शामिल किया गया है, होता भी क्यों नहीं, एक ख़ूबसूरती पढ़ने और समझने वाले की नज़र में ताज अपनी
सुंदरता के लिए ही जाना जाता है
सफ़ेद संगमरमर की शानदार ईमारत को एक मक़बरा के रूप में ही जाना जाता है,
कुछ लोग इसमें शिवलिंग होने का दावा भी करते हैं,
मेरी इच्छा इन सबमें नहीं थी ,
मैं बस ताज का दीदार करना चाहता था जो घर रही सांझ मे और भी
खूबसूरत होते जा रही थी लोगों का हूजूम था कि थमने का नाम नहीं ले रहा था ...
जो ताज का दीदार कर चुके हैं वो जानते
हैं कि वहां पर दो तरह की प्रवेश व्यवस्था
है , एक तो वो जिसमें आप 45 रुपये का टिकट लेते हैं और ताजमहल के चारों ओर घूमकर
दूर से उसे देख पाते हैं , बीतर मकबरे तक प्रवेश की इजाजत इसमें नहीं होती , मगर हां
इतना भी काफी होता है , ताज के सौंदर्य के लिए इतना ही देखा जाना काफी होता है
.... किसी शायर ने कहा भी है
मैनें उसको इतना देखा जितना जितना देखा जा सकता था
लेकिन आखिर दो आंखों से कितना देखा जा सकता था .....
मैं उस खूबसूरती को करीब से देखना चाहता था , दसअसल मैं ऐसी जगहों को मैं देखने
से ज्यादा महसूस करना चाहता हूँ , इसलिए मैंने 250 रुपये की टिकट वाला दूसरा
रास्ता चुना और भीतर मकबरे तक जाने की ठानी , पूरा परिवार भी इस बात पर एकमत था कि
ताज को पूरा भीतर तक देखा जाए .... फिर क्या था ... बात बन गई ..... एक एख दूसरा
दायरा था जिसके चलते भीड़ भी कम हो गई क्योंकि ऐसे लोगों की संख्या उतनी नही थी
..... हांलांकि वह भी कम नहीं थी मगर तुलनात्मक रुप से भीड़ थोड़ी छंट सी गई ।
देश –विदेश से आए सैलानी ताज को देखने और तसवीरें उतारने में लगे थे .....
विदेशियों के साथ तसवीरे लेने के शौक ने हमको भी आकर्षित किया , कुछ टूटी फूटी
भाषा में वहां कोरिया से आए एख दल से बात की वे केवल ताज का नाम सुनकर उसे देखने
आए थे , मजे की बात तो यह थी कि वे हमारी परंपरागत वेशभूषा साड़ी मे थे और हम लोग अंग्रेज
बने फिर रहे थे .....खैर यह दूसरा पहलू है इस बात किसी ओर कालखंड मे बात करेंगे
.......
ताजमहल की हिस्ट्री
और इसके शाहजहां से जुड़े किसी तथ्य को उल्लेखित करके मैं आपको बोर नही करना चाहूंगा
क्योंकि यह सब आपने बहुत पढ़ा-सुना होगा
मगर यमुना के किनारे खड़े होकर जब आप इस इमारत को निहारेंगे तब आपको लगेगा कि ....
सच में आज तो अपुनिच्च भगवान हैं .... शानदार फीलिंग आती है बास ..... ताजमहल के
चारोंओर चार मीनारो पर भी बहुत बातें होती है .... इनका मुख्य इमारत से कोई सीधा
संबंध नजर नहीं आता और मुझे लगा कि केवल खूबसूरती बढ़ाने के लिए इसे बनाया होगा
.... मैं बस ऐसा जिक्र कर ही रहा था कि किसी ने बताया कि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक
कारण है , केवल सुंदरता के लिए ऐसा नहीं किया गया है ताजमहल के चारों कोनों पर स्थित चारों मीनारों को
देखें तो वे थोड़ी बाहर की ओर झुकी हुई कहते है कि भूकंप या गिरने की स्थिति में मुख्य मकबरे को
नुकसान न हो की संरचनात्मक सुरक्षा इसका
बड़ा कारण रहा होगा
वहीं यहां पर पूरब की ओर मस्जिद और जवाब (एक
जैसी इमारत) है जो स्थापत्य संतुलन (Structural & Visual Balance) पूर्ण सममिति बनाए रखने के लिए उपयोगी है आइए अब चारबाग़ की ओर रुख करते हैं ये ऐसी जगह है जहां बाग़ चार समान भागों में बंटा हुआ है इसके पीछे का गणित तो पता नहीं मगर ताजमहल का खूबसूरत
यहां से देखा जा सकता है
एक और खास बात
मैं महसूस कर रहा था कि ताजमहल की हर संरचना दाएँ–बाएँ समान हैं शायद इंजीनियरिंग
और संतुलन का ध्यान रखा गया हो .....
शाम गहरा रही थी ओर रात में वहां लाइट
नहीं होती इसलिए सभी को धीरे-धीरे बाहर की ओर रुख करना ही था .... मैं यह सोचकर
अचंभित था कि रात में यहां लाइट क्यों नही जलाई जा रही है क्योंकि यह तो इतनी
शानदार ईमारत है और आज पर्यटक भी हैं 25 दिसंबर भी है ..... मगर न तो कोई लाइटिंग
थी और न ही चकाचौंध । इसके पीछे के कारण को जानने की कोशिश में पता चला कि ताजमहल में रात की लाइटिंग न होने के कारण संगमरमर
की सुरक्षा, कीट-प्रदूषण से बचाव, UNESCO व ASI के नियम, पर्यावरण संरक्षण और ऐतिहासिक
सौंदर्य बनाए रखना है वैसे भी मुगल काल में ताजमहल को चाँदनी में देखने
योग्य बनाया गया था आज भी
पूर्णिमा की रात सीमित समय के लिए चंद्रप्रकाश दर्शन (Moonlight
Viewing) की अनुमति है ।
जो भी हो ताज का दीदार शानदार रहा
जिसने भी बनाया और जिसकी भी कल्पना रही हो ....वाह ताज !




