सौरभ द्विवेदी की तर्ज पर ही शुरु करते हैं
नमस्कार हमारा नाम है प्रमोद शर्मा और आप पढ़ना शुरु कर चुके हैं www.pramodsharma.online
इन दिनों सौरभ चर्चे में हैं ,
उन्होंने लल्लनटाप छोड़ दी....... मुझ जैसे बहुतों को यह भ्रम था कि ये देसी किस्म
का चैनल इन्ही महाशय की संपत्ति है और वे इंडिया टुडे जैसे प्रतिष्ठित समूह के साथ
किसी साझेदारी में इसका संचालन कर रहे हैं ( जैसा कि आजकर अनेक व्यवसायों में देखा
जाता है ) मगर इस खबर से इतनी धुंध तो छंट ही गई कि दी लल्लनटाप का मालिकाना हक
केवल और केवल इंडिया टुडे समूह के पास है .....
अब यह खबर सारे प्लेटफार्म पर छाया हुआ है, स्वयं
सौरभ ने एक वीडियो बनाकर उसकी पुष्टि कर दी....उनकी एक पोस्ट भी दिख रही है जिसमें वे टाटा-बायबाय कहते पढ़े जा
सकते हैं.....
आम तौर पर किसी भी संस्थान में जरुरत के अनुसार
लोगों की नियुक्ति होती है .....लोग संस्थानों में आते हैं,
जाते हैं, कई बार तो लोग वापस भी आते हैं...यह
नौकरी वालों के लिए एक प्रक्रिया है उससे बड़ा कुछ नहीं और यह एक सामान्य घटना की
तरह देखी जानी चाहिए....केवल पत्रकारिता ही नहीं निजी स्कूल, अस्पताल आदि में भी
लोगों की नौकरी कभी स्थाई नहीं होती .... हां इसका सुख लेना है तो सरकारी नौकरी की
तरफ रुख करना होता है ....... निजी संस्थान अपनी जरुरत, अपनी सहूलियत और अपनी आर्थिक
स्थिति के अनुकूल मानव संसाधन का चयन कर लेते हैं ...... सौरभ भी शायद इसी तरह से
तुने गए होंगे..... आज वे उस मीडिया समूह के हिस्सा नहीं है .... इसे केवल इतना ही
मान लेना सही होगा ।
अब बात आती है क्या इतनी ही मान लेना ठीक
होगा .... र क्या सौरभ का जाना भी ऐसे ही सामान्य घटना है ...... हो सकता है
अंदरखाने बहुत कुछ पका होगा तब जाकर यह खबर बनी और एक स्थापित चैनल से एक स्थापित
पत्रकार ने विदाऊ ली ....... मीडिया में खबर कुछ इस तरह से फैली है,
सारे सोशल मीडिया की दीवारों पर यही खबर चिपकी हुई है....ऐसा क्यों
है?
कुछ बातें हमें समझनी होंगी कि जो इस घटना से
जुड़ी हो सकती हैं , जब कोई व्यक्ति संस्थान से उपर हो जाता है तब संस्थान भी
यह समझना शुरु कर देता है कि अब हमारी
ब्रांडिंग के बजाय इस व्यक्ति की ब्रांडिंग होने लगी है ...... ऐसे में किसी तरह
से इसे बिदा कर दिया जाए ........ इसका एक पहलू यह भी हो सकता है कि व्यक्ति को यह
लगने लगे कि यह पूरा संस्थान या कार्यक्रम केवल मेरी वजह से चल रहा है इसलिए कोई
मनमानी मांग कर लिए जाने का यह सही वक्त है ... कुछ मांग ही लेना चाहिए ..... ...
संभावनाएं दोनों ही तरह की हो सकती है ....... ऐसे में संस्थान अक्सर कर्माचारी से
ही मुक्ति पाना पसंद करते हैं ....... पिछले कुछ दिनों में ऐसा ही घटनाक्रम कोचिंग संस्थानों में भी देखने को आया
है ........ जब कोई शिक्षक का नाम हो जाता है तो कोचिंग समूह उन्हे अपने बैनर के
तले लाने के लिए लालायित हो उठते हैं और ऐसे मे शिक्षक भी अपनी मनमानी बोली लगाता
है ...... फिर संस्थान उस शिक्षक की आड़ में अपने प्रचार करता है ...... कभी यह तरकीब काम कर जाती है तो कभी इससे
नुकसान भी हो जाता है ....... हो सकता है सौरभ का इस्तीफा इनमें से किस एक वजह से हो ।
घटना कोई भी हो उसे उसके समग्रता और संतुलन
में देखना उचित होगा ,...सौरभ के विषय में सोशल मीडिया जैसा प्रतिक्रिया परोस रहा है वह एक बहस का विषय हो सकता है. हमारा
आलोचक वर्ग किसी व्यक्ति या घटना को हमेशा एक अतिरंजित स्वरुप में देखने और प्रकट करने
का आदी है, उसे हर बात में एख ही धुन रहती है ....वह किसी को भी एकदम ब्लैक या फिर एकदम
व्हाइट में देखता है, किसी को चढ़ाया जाएगा तो चने
की झाड़ में या फिर पटका जाएगा तो सीधे फर्श पर...मैं पिछले 24 घंटों से इन सभी
प्रतिक्रियाओं में यही पढ़ रहा हूं..…कोई उसे सत्ता की ओर झुका बता रहा तो कोई उसे
हरिश्चंद्र.....बात जबकि हमेशा बीच की होती है....यह एक सामान्य मनोवैज्ञानिक तथ्य
है कि कोई व्यक्ति पूरा बुरा या पूरा अच्छा हो ही नहीं सकता, हमारे शरीर, दिमाग और दिल का जो साफ्टवेयर है वो कुछ
इसी तरह से बनाया गया है....
सौरभ भी एक सामान्य व्यक्ति हैं,
उनके अपने हित हो सकते हैं कोई बड़ी योजना भी हो सकती है महत्वाकांक्षा.भी
हो सकती है क्योंकि जब आप सफल होते हैं तो उससे और बेहतर करने तथा अदिक पाने की
लालसा बलवती होती है ....... होनी भी चाहिए ...... संतोष अलग बात है और ललक दूसरी
बात हो सकता है जो इस मंच से बाहर उनको अपने किसी उद्देश्य के पूरी होने की
संभावना दिखाई दी हो...हमें उसे ऐसे ही
स्वीकार करना चाहिए.....यह भी हो सकता है कि उनकी कोई मांग प्रबंधन ने नहीं सुनी
हो या किसी मुद्दे पर असहमति बनी हो ...... दोनों ही स्थितियों में इस निर्णय को
स्वागत करना चाहिए क्योंकि सौरभ ने अपनी ओर से कोई ऐसी बात नहीं कही जो अपने पूर्व
प्रबंधन के विरुद्ध हो इसी तरह इंडिया टुडे समूह ने भी कोई ऐसा वक्त्व्य नहीं जारी
किया है ..., सब कुछ आपसी सहमति में हुआ है तब वेवजह की बात बेमानी है
मेरी अपनी निजी राय इस व्यक्ति के बारे में
ठीक-ठाक है, एक शानदार प्रस्तोता जिसने हिन्दी को पूरी
दमदारी के साथ सामने रखा, देहाती स्पर्श को आभिजात्य वर्ग के
डाइनिंग रूम तक ले जाने का पूरा प्रयास किया और सफल भी रहे, साक्षात्कार
का परंपरागत तरीका बदला.....अनेक ऐसे लोगों को हमसे मिलवाया जिनसे मिलना वाकई सुखद
रहा....
आप लाख बुराई कर लें मगर हिन्दी भाषी और
हिन्दी प्रेमी लोग इस व्यक्ति की धमक हमेशा याद रखेंगे
आपने पढ़ा प्रमोद को ...


